Tuesday, May 11, 2021
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गलवान घाटी में बिहार रेजिमेंट के वीर सपूतों ने फिर रचा शौर्य का इतिहास, 300 मक्कार चीनियों से लड़े 20 सैनिक?

भारतीय सेना के बिहार रेजिमेंट का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। वीरता और बलिदान में इसका कोई सानी नहीं। कारगिल, मुम्बई हमले और उरी के बाद बिहार रेजिमेंट के वीर सपूतों ने अब लद्दाख की गलवान घाटी में फिर अपने शौर्य का परिचय दिया है। इस रेजिमेंट के चार सैनिकों ने 15 जून को देश रक्षा के लिए बलिदान दे दिया। धोखेबाज और मक्कार चीनियों ने अगर धोखे से वार न किया होता तो वे कभी वीरगति को प्राप्त नहीं होते। चीनियों को यूं ही ‘पीला बिच्छू’ नहीं कहा जाता। बिना वजह वे कब डंक मार दें, कहना मुश्किल है। 1962 में चीन ने दोस्ती का दिखावा कर भारत की पीठ में खंजर भोंका था। 58 साल बाद फिर उसने धोखा दे कर भारतीय सैनिकों को मारा है। बिहार रेजिमेंट की स्थापना 1941 में हुई थी जिसका मुख्यालय पटना के पास दानापुर में है। बिहार रेजिमेंट सेंटर दानापुर देश की दूसरे सबसे बड़ी सैनिक छावनी है। गलवान की घटना से पूरे देश के साथ-साथ बिहार में बेहद गुस्सा है। आम-अवाम की यही राय है कि इस शहादत का बदला लेने के लिए अब भारत को गलवान घाटी में चीन पर सीधे हमला बोल देना चाहिए। दुश्मन को दंड देने का यही सबसे सही समय है। अब देखना है कि केन्द्र सरकार देशहित में क्या फैसला लेती है।

बिहार रेजिमेंट की गलवान में शौर्यगाथा

बिहार रेजिमेंट की गलवान में शौर्यगाथा

लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्र्ण रेखा के पास पिछले एक महीने से तनाव की स्थिति है। दोनों तरफ से सौनिकों का जमावड़ा लगा हुआ है। सीमा पर तनाव कम करने के लिए बीतचीत चल ही रही थी कि चीन ने धोखा देकर भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया। सोमवार की रात हुए इस हमले में 16, बिहार रेजिमेंट के कमाडिंग ऑफिसर कर्नल बी संतोष बाबू, जेसीओ कुंदन कुमार ओझा और कुंदन कुमार शहीद हो गये। कर्नल संतोष बाबू तेलंगाना के रहने वाले थे। जब कि कुंदन कुमार ओझा और कुंदन कुमार बिहार के रहने वाले थे। कुंदन कुमार ओझा का मूल गांव पहरपुर, भोजपुर जिले के बिहिया थाना में पड़ता है। उनके दादा और पिता जी अब झारखंड के साहिबगंज में रहते हैं। कुंदन की बहाली 2011 में दानापुर रेजिमेंट सेंटर में ही हुई थी। वहीं उन्होंने लिखित और फिजिकल टेस्ट पास किया था। फिर उन्होंने 2012 में 16, बिहार रेजिमेंट में योगदान दिया था। इसके अलावा छपरा चंचौरा के संजय कुमार और सहरसा के कुंदन कुमार ने भी देश के लिए अपना जीवन न्योछावर किया है।

बहादुरी से लड़ कर वीरगति को प्राप्त हुए 20 सैनिक

बहादुरी से लड़ कर वीरगति को प्राप्त हुए 20 सैनिक

गलवान में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सैनिकों की संख्या कम करने और उनके पीछे हटने के लिए भारत और चीन में बातचीत चल रही है। वार्ता के मुताबिक चीनी सैनिकों को सोमवार तक अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे हट जाना था। उन्हें अप्रैल महीने के पोजिशन पर जाना था। जब सोमवार रात तक चीनी सैनिक वहां से नहीं हटे तो 16,बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर वी. संतोष बाबू चीनी अधिकारियों से बात करने के लिए गये। उनके साथ 20 अन्य सैनिक भी थे। इसी दौरान चीनी सैनिकों ने संतोष बाबू से हाथापायी शुरू कर दी। चीनी सैनिकों ने एक कृत्रिम पहाड़ी पर कैंप बना रखा था। वहां करीब 300 चीनी सैनिक थे। संतोष बाबू भी बात कर ही रहे थे कि चीनी सैनिक बदतमीजी से पेश आने लगे। चीनियों ने भारतीय सैनिकों की कम संख्या देख कर मारपीट शुरू कर दी। चीनी जानते थे कि इस लड़ाई में गोली नहीं चलानी है क्यों कि इससे भारत और चीन में वास्वविक युद्ध शुरू हो जाएगा। कुछ चीनी सैनिकों ने कील लगी लोहे के ग्लब्स पहन रखे थे। कुछ के हाथ में रॉड और डंडे थे। 300 चीनी सैनिकों ने बिहार रेजिमेंट के 20 सैनिकों को घेर लिया और हमला बोल दिया। भारत के 20 सैनिक वीरता से लड़ते रहे। बनावटी पहाड़ी इस लड़ाई का भार नही उठा सकी और वह अचानक ढह गयी। उसके बगल में ही एक खाई थी जिसमें बर्फिला पानी भरा हुआ था। इस पानी में गिरने की वजह से भारत के 20 सैनिकों के शहीद होने की खबर है। खबरों के के मुताबिक चीनी के भी 43 सैनिक हताहत हुए हैं।

बिहार रेजिमेंट का गौरवशाली इतिहास

बिहार रेजिमेंट का गौरवशाली इतिहास

अमित शाह बोले- सीमा पर शहीद हुए जवानों का कर्जदार रहेगा देशभारतीय सेना में बिहार रेजिमेंट की शौर्यगाथा गौरव का विषय रही है। 1999 के कारगिल युद्ध में इस रेजिमेंट के कैप्टन गुरजिंदर सिंह सूरी और मेजर मरियप्पन सरावनन ने पाकिस्तानी सैनिकों के पांव उखाड़ दिये थे। इनकी वजह से पाकिस्तानी सेना को बटालिक सेक्टर के जुबर रिज से भागना पड़ा था। दोनों वीर सपूत इस लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए थे। कैप्टन गुरजिंदर सिंह को मरणोपरांत महावीर चक्र और मेजर मरियप्पन को मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया गया था। इस लड़ाई में बिहार रेजिमेंट के 18 जवान शहीद हुए थे जिनकी स्मृति में पटना के कारगिल चौक पर एक स्मारक बनाया गया है। 2008 में मुम्बई पर आंतकी हमले के समय बिहार रेजिमेंट के मेजर संदीप उन्नीकृष्णनन एनएसजी में प्रतिनियुक्ति पर गये थे। जब पाकिस्तानी अंतकियों के खिलाफ एनएसजी ने होटल ताज पैलेस में ऑपरेशन लॉन्च किया गया तो मेजर संदीप वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गये थे। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। 2016 में जम्मू कश्मीर के उरी में पाकिस्तानी आतंकियों से लोहा लेते हुए बिहार रेजिमेंट के 15 जवान शहीद हुए थे। बिहार रेजिमेंट के वीर सैनिक प्राणों की आहूति दे कर देश की रक्षा करते रहे हैं।

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