Tuesday, May 11, 2021
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‘माउंटेन मैन’ नाम से मशहूर #DashrathManjhi की इकलौती बेटी लौंगिया देवी की मौत, परिवार के आरोप और प्रशासन की खानापूर्ति, पढ़िए माउंटेन मैन की घर से ग्राउंड रिपोर्ट।

‘माउंटेनमैन’ नाम से मशहूर दशरथ मांझी की इकलौती बेटी लौंगिया देवी की मौत 4 दिसंबर की सुबह गया के गहलौर गांव में हो गई. ये वही दशरथ मांझी हैं जिन्होंने अपनी पत्नी के देहांत के बाद उनके कष्ट को ध्यान में रखकर 1960 से 1982 के बीच 22 सालों में पहाड़ काट कर सड़क बनाई थी. इस रास्ते को बनाने में लौंगिया देवी ने भी अपने पिता की मदद की थी. इस सड़क ने गया के अतरी और वजीरगंज की दूरी को 55 से 15 किमी कर दिया था.

गरीबों के शाहजहां कहलाने वाले “माउंटेन-मैन” ने कभी सुविधा नाम की चीज नहीं देखी. उनकी बहू भी सुविधा के आभाव में सही इलाज न मिलने के कारण 2014 में दुनिया से रुखसत हो गईं. अब दशरथ मांझी की इकलौती बेटी भी गरीबी के बीच दुनिया को अलविदा कह गई हैं.

मांझी की बेटी के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी शोक जताया. उन्होंने ट्वीट में लिखा, ‘माउंटेन मैन दशरथ मांझी जी की पुत्री लौंगी देवी जी का निधन दु:खद. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें.’ दशरथ मांझी के परिवार को हुए इस नुकसान पर बिहार मुख्यमंत्री के कार्यालय से भी नोट जारी किया गया है.


‘शोक की नहीं, हल की जरूरत मुख्यमंत्री जी’
दशरथ मांझी की पोती लक्ष्मी कुमारी परिवार में दो शिक्षित लोगों में से एक हैं. वो बताती हैं कि परिवार जॉइंट फैमिली है, जिसमें बुआ और पिताजी का परिवार साथ-साथ रहते हैं. कुमारी ने कहा, “हमारी बुआ लौंगिया देवी सांस की समस्या के कारण एक महीने से बीमार थीं. जिनका मगध मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा था.”

करीब एक हफ्ते पहले पटना इलाज के लिए रेफर किया गया था, लेकिन उन्हें हम वापस घर ले आए. जब वह घर आईं तो ठीक थीं, लेकिन खाना ठीक से नहीं खा पर रही थीं, अचानक तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और देहांत हो गया.
लक्ष्मी कुमारी, दशरथ मांझी की पोती
सरकार की तरफ मिलने वाली सुविधा पर लक्ष्मी कुमारी कहती हैं कि प्रशासन ने मां की तरह बुआ को भी अस्पताल में दाखिल कर दिया, लेकिन क्या उनका इतना ही फर्ज है?

बुआ के तीन लड़के और एक लड़की गांव से 70 किलोमीटर दूर ईंट भट्टे पर काम करते हैं, उनको नौकरी मिल जाती तब मानते कि हां सरकार ने सुविधा दी है. मुख्यमंत्री जी ने 2014 में मां के देहांत के बाद जिस तरह से शोक जताया था उसी तरह से फिर शोक जता दिया. शोक से क्या मिलेगा? शोक से हमारी समस्या थोड़ी खत्म होंगी. कायदे से मुख्यमंत्री जी को घर आकर हमारी समस्या का स्थायी हल निकालना चाहिए.
लक्ष्मी कुमारी, दशरथ मांझी की पोती

‘रोजगार होता तो मां का अच्छा इलाज करा पाता’
लौंगिया मांझी के पुत्र बिन्दा मांझी ने क्विंट को बताया कि हम तीन भाई और एक बहन ईंट भट्टे पर काम करते हैं, जहां 200 रूपये मजदूरी में मिलते हैं. बिन्दा ने कहा, “काम रोजाना नहीं मिलता, हफ्ते में तीन से चार दिन ही काम मिलता है. जब इतनी छोटी कमाई से हमारा घर ठीक से नहीं चलता तो इस कमाई से हम अपनी मां का इलाज कैसे करवा सकते थे.”

अगर बेहतर सुविधा होती, रोजगार से जुड़े होते तो हम आज अपनी मां का ठीक से इलाज करा सकते थे. लेकिन सरकार को बस इतना पता है कि बीमार हैं तो अस्पताल में भर्ती कर दो. कोई हमारे निवालों की नहीं सोचता. हमारे नाना का नाम इस्तेमाल कर नेता से अभिनेता तक बस खुद को हाइलाइट करते रहे हैं.
बिन्दा मांझी, लौंगिया मांझी के पुत्र
लक्ष्मी कुमारी के पति मिथुन मांझी कहते हैं कि बाबा और बुआ ने बड़े संघर्ष से पहाड़ काट कर रास्ता बनाया, पूरे देश में उनकी वाहवाही हुई होगी, केतन मेहता ने फिल्म बना दी, सभी को गर्व होने लगा लेकिन गर्व से पेट की भूख नहीं मिटती.

दशरथ मांझी का सपना था इलाके का विकास हो. क्योंकि इलाके का विकास होगा तो ही दशरथ मांझी और बाकी परिवारों का विकास होगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा होता तो दशरथ मांझी के ही गया में सालों बाद लौंगी भुइयां को 20 साल लगाकर नहर नहीं खोदनी पड़ती.

ठीक है मेरे बाबा ने नाम किया लेकिन सरकार की जिम्मेदारी भी तो कुछ है? केतन मेहता ने कहा था कि फिल्म की इनकम का 2% लाभ बतौर रॉयल्टी दशरथ मांझी के परिवार को देंगे, लेकिन एक लाख रूपये ही मिले. आमिर खान ने भी “सत्यमेव-जयते” के लिए बाबा के नाम का इस्तेमाल किया. उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें कीं लेकिन हम लोगों को फायदा क्या हुआ? सोनू सूद ने लॉकडाउन में कहा कि हमारे परिवार की गरीबी खत्म कर देंगे, लेकिन गरीबी खत्म करने के नाम पर सिर्फ एक बोरा आटा, एक बोरा चावल, तेल और कुछ दाल भेजी.
मिथुन मांझी, लक्ष्मी कुमारी के पति

प्रशासन का क्या कहना है?
स्थानीय BDO शंभू चौधरी ने बड़े गर्व से क्विंट को बताया कि दशरथ मांझी के बेटे भगीरथ मांझी और बेटी लौंगिया माझी के लिए घर के नाम पर चालीस हजार रूपये की पहली किस्त इंद्रा गांधी आवास योजना के तहत भेज दे गई है. चौधरी ने कहा, “दोनों लोगों को 400 रूपये की वृद्धा पेंशन योजना दी जाती रही है. नौकरी के नाम पर दशरथ मांझी की पोती पारा शिक्षक हैं. वहीं उनके पति को DM साहब ने पर्यटन विभाग में काम पर लगा दिया है.”

स्थानीय BDO की इस टिप्पणी पर जब क्विंट ने मिथुन मांझी से पूछा कि क्या उनकी पर्यटन विभाग में नौकरी लग गई गई है? तो मिथुन ने कहा:

नहीं मुझे किसी तरह की कोई नौकरी नहीं मिली और मेरी पत्नी के पारा शिक्षक बनने में प्रशासन का कोई रोल नहीं है. मैं तो जीविका चलाने के लिए स्नातक तक शिक्षित होने के बाद खेती करता हूं. रही बात आवास की तो सरकार के आला अधिकारी से मंत्री तक बाबा के नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं, फिर आवास प्रक्रिया के लिए इतने दिन क्यों लगे?
ADM मनोज कुमार ने क्विंट से कहा कि “जैसे ही दशरथ मांझी की बेटी की स्वास्थ्य समस्या की खबर लगी, हमने उनको फौरन मगध मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया, जहां से पटना के लिए रेफर किया गया, लेकिन परिवार उनको घर ले गया.’

कुमार ने कहा कि उनकी गरीबी को देख कर आवास की डिमांड पूरी कर दी गई है. लेकिन क्विंट ने पूछा कि उनकी गरीबी को समझने में प्रशासन को इतना समय क्यों लगा? इस पर ADM ने कहा, “इसके पहले उनको क्या-क्या दिया गया है मुझे पता करना होगा. मैं अभी हाल ही में आया हूं. रही बात 5 एकड़ जमीन की जो बंजर है तो यह बात आप से पता चली. वैसे मैं कहूंगा कि जमीन इनकी चॉइस से दी गईं होगी.”

माउंटेन-मैन” ने कभी सुविधा नाम की चीज नहीं देखी. उनकी बहू भी सुविधा के आभाव में सही इलाज न मिलने के कारण 2014 में दुनिया से रुखसत हो गईं. अब दशरथ मांझी की इकलौती बेटी भी गरीबी के बीच दुनिया को अलविदा कह गई हैं.

मांझी की बेटी के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी शोक जताया. उन्होंने ट्वीट में लिखा, ‘माउंटेन मैन दशरथ मांझी जी की पुत्री लौंगी देवी जी का निधन दु:खद. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें.’ दशरथ मांझी के परिवार को हुए इस नुकसान पर बिहार मुख्यमंत्री के कार्यालय से भी नोट जारी किया गया है.


‘शोक की नहीं, हल की जरूरत मुख्यमंत्री जी’
दशरथ मांझी की पोती लक्ष्मी कुमारी परिवार में दो शिक्षित लोगों में से एक हैं. वो बताती हैं कि परिवार जॉइंट फैमिली है, जिसमें बुआ और पिताजी का परिवार साथ-साथ रहते हैं. कुमारी ने कहा, “हमारी बुआ लौंगिया देवी सांस की समस्या के कारण एक महीने से बीमार थीं. जिनका मगध मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा था.”

करीब एक हफ्ते पहले पटना इलाज के लिए रेफर किया गया था, लेकिन उन्हें हम वापस घर ले आए. जब वह घर आईं तो ठीक थीं, लेकिन खाना ठीक से नहीं खा पर रही थीं, अचानक तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और देहांत हो गया.
लक्ष्मी कुमारी, दशरथ मांझी की पोती
सरकार की तरफ मिलने वाली सुविधा पर लक्ष्मी कुमारी कहती हैं कि प्रशासन ने मां की तरह बुआ को भी अस्पताल में दाखिल कर दिया, लेकिन क्या उनका इतना ही फर्ज है?

बुआ के तीन लड़के और एक लड़की गांव से 70 किलोमीटर दूर ईंट भट्टे पर काम करते हैं, उनको नौकरी मिल जाती तब मानते कि हां सरकार ने सुविधा दी है. मुख्यमंत्री जी ने 2014 में मां के देहांत के बाद जिस तरह से शोक जताया था उसी तरह से फिर शोक जता दिया. शोक से क्या मिलेगा? शोक से हमारी समस्या थोड़ी खत्म होंगी. कायदे से मुख्यमंत्री जी को घर आकर हमारी समस्या का स्थायी हल निकालना चाहिए.
लक्ष्मी कुमारी, दशरथ मांझी की पोती

‘रोजगार होता तो मां का अच्छा इलाज करा पाता’
लौंगिया मांझी के पुत्र बिन्दा मांझी ने क्विंट को बताया कि हम तीन भाई और एक बहन ईंट भट्टे पर काम करते हैं, जहां 200 रूपये मजदूरी में मिलते हैं. बिन्दा ने कहा, “काम रोजाना नहीं मिलता, हफ्ते में तीन से चार दिन ही काम मिलता है. जब इतनी छोटी कमाई से हमारा घर ठीक से नहीं चलता तो इस कमाई से हम अपनी मां का इलाज कैसे करवा सकते थे.”

अगर बेहतर सुविधा होती, रोजगार से जुड़े होते तो हम आज अपनी मां का ठीक से इलाज करा सकते थे. लेकिन सरकार को बस इतना पता है कि बीमार हैं तो अस्पताल में भर्ती कर दो. कोई हमारे निवालों की नहीं सोचता. हमारे नाना का नाम इस्तेमाल कर नेता से अभिनेता तक बस खुद को हाइलाइट करते रहे हैं.
बिन्दा मांझी, लौंगिया मांझी के पुत्र
लक्ष्मी कुमारी के पति मिथुन मांझी कहते हैं कि बाबा और बुआ ने बड़े संघर्ष से पहाड़ काट कर रास्ता बनाया, पूरे देश में उनकी वाहवाही हुई होगी, केतन मेहता ने फिल्म बना दी, सभी को गर्व होने लगा लेकिन गर्व से पेट की भूख नहीं मिटती.

दशरथ मांझी का सपना था इलाके का विकास हो. क्योंकि इलाके का विकास होगा तो ही दशरथ मांझी और बाकी परिवारों का विकास होगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा होता तो दशरथ मांझी के ही गया में सालों बाद लौंगी भुइयां को 20 साल लगाकर नहर नहीं खोदनी पड़ती.

ठीक है मेरे बाबा ने नाम किया लेकिन सरकार की जिम्मेदारी भी तो कुछ है? केतन मेहता ने कहा था कि फिल्म की इनकम का 2% लाभ बतौर रॉयल्टी दशरथ मांझी के परिवार को देंगे, लेकिन एक लाख रूपये ही मिले. आमिर खान ने भी “सत्यमेव-जयते” के लिए बाबा के नाम का इस्तेमाल किया. उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें कीं लेकिन हम लोगों को फायदा क्या हुआ? सोनू सूद ने लॉकडाउन में कहा कि हमारे परिवार की गरीबी खत्म कर देंगे, लेकिन गरीबी खत्म करने के नाम पर सिर्फ एक बोरा आटा, एक बोरा चावल, तेल और कुछ दाल भेजी.
मिथुन मांझी, लक्ष्मी कुमारी के पति

प्रशासन का क्या कहना है?
स्थानीय BDO शंभू चौधरी ने बड़े गर्व से क्विंट को बताया कि दशरथ मांझी के बेटे भगीरथ मांझी और बेटी लौंगिया माझी के लिए घर के नाम पर चालीस हजार रूपये की पहली किस्त इंद्रा गांधी आवास योजना के तहत भेज दे गई है. चौधरी ने कहा, “दोनों लोगों को 400 रूपये की वृद्धा पेंशन योजना दी जाती रही है. नौकरी के नाम पर दशरथ मांझी की पोती पारा शिक्षक हैं. वहीं उनके पति को DM साहब ने पर्यटन विभाग में काम पर लगा दिया है.”

स्थानीय BDO की इस टिप्पणी पर जब क्विंट ने मिथुन मांझी से पूछा कि क्या उनकी पर्यटन विभाग में नौकरी लग गई गई है? तो मिथुन ने कहा:

नहीं मुझे किसी तरह की कोई नौकरी नहीं मिली और मेरी पत्नी के पारा शिक्षक बनने में प्रशासन का कोई रोल नहीं है. मैं तो जीविका चलाने के लिए स्नातक तक शिक्षित होने के बाद खेती करता हूं. रही बात आवास की तो सरकार के आला अधिकारी से मंत्री तक बाबा के नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं, फिर आवास प्रक्रिया के लिए इतने दिन क्यों लगे?
ADM मनोज कुमार ने क्विंट से कहा कि “जैसे ही दशरथ मांझी की बेटी की स्वास्थ्य समस्या की खबर लगी, हमने उनको फौरन मगध मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया, जहां से पटना के लिए रेफर किया गया, लेकिन परिवार उनको घर ले गया.’

कुमार ने कहा कि उनकी गरीबी को देख कर आवास की डिमांड पूरी कर दी गई है. लेकिन क्विंट ने पूछा कि उनकी गरीबी को समझने में प्रशासन को इतना समय क्यों लगा? इस पर ADM ने कहा, “इसके पहले उनको क्या-क्या दिया गया है मुझे पता करना होगा. मैं अभी हाल ही में आया हूं. रही बात 5 एकड़ जमीन की जो बंजर है तो यह बात आप से पता चली. वैसे मैं कहूंगा कि जमीन इनकी चॉइस से दी गईं होगी.”

साभार- quint hindi & सरताज आलम

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